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आपकी महफिल

पत्थर का मेरी ओर तो आना जरूर था मैं ही गुनहगारोँ में इक बेकसूर था सचाई आग ठहरी तो लब .....


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  #1  
Old January 30th, 2010
Justpunjabi
 
आपकी महफिल

पत्थर का मेरी ओर तो आना जरूर था
मैं ही गुनहगारोँ में इक बेकसूर था

सचाई आग ठहरी तो लब जल के रह गए
हकगोई पर हमें भी कभी क्या ग़रूर था

शबनम पहन के निकले थे शोलोँ के काफिले
देखे पोशाक के नीचे ये किस को शऊर था

बैठा हुआ था कोई सरे-राह-आरज़ू
इक उम्र की थकन से बदन चूर-चूर था

ठहरा हुआ है एक ही मंजर निगाह में
इक आधा खुला दरीचा था इक सैलाबे-नूर था

बनकर जबान बोल रहा था बदन तमाम
समझे न हम तो अकल का अपना कसूर था
  #2  
Old January 30th, 2010
~neha~
 
Re: आपकी महफिल

nice one dear
tfs
  #3  
Old May 27th, 2010
.::singh chani::.
 
Re: आपकी महफिल

nice tfs......
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